Friday, February 20, 2015

ख़ोज


(कन्याकुमारी जाते हुए 2006 Feb)

"इन बादलों से हमारे बहुत पुराने नातें हैं,
होता हैं जब भी दिल उदास, ये बरस जाते हैं.

हम लफ़्ज़ों में कब कह पाए अपना हाल-ऐ-दिल,
जाने ये कैसे हमारी खामोशी भी समझ जाते हैं.

कुछ तो इन जैसा अब हममें भी नज़र आता है,
न इन्हे ख़बर कहा से आए, न हमें पता किधर को जाते हैं."

चलना


(Kolkata 2008 Feb)

जाते जाते वो ज़िन्दगी जीने के फल्सफे बता रहा था
सुन के उसकी बातें दिल जीने से और घबरा रहा था

सोच कर कभी बेबाक हँसता हूँ, कभी उदास होता हूँ
कल तलक वो ताउम्र साथ चलने की कसमे खा रहा था

तेरी अलविदा सुन कर कबसे रुका है उसी मुकाम पर
जाने कितनी सदियों से वक्त बस चला जा रहा था

बाइक


(Kolkata Mar 2008)

वो मेरी बाइक याद है तुम्हे
जिसपे रात भर आवारों की तरह
शहर की गलियों की धूल फांकते थे
बारिशों के मौसम में ऑफिस से
छुट्टी मार शहर के रास्ते नापते थे
मोड़ की दुकान से दूसरे शहर घूम कर आने तक
तुम्हारे हाथ के कंधे से कमर तक जाने तक
सब कुछ इसने चुपचाप देखा कभी कुछ नही कहा
मगर पिछले कुछ दिनों से ये बहकी-बहकी सी रहती थी
जब भी इसकी तरफ़ देखता जाने क्या-क्या कहती थी
पूछती थी की अब मैं तुम्हारी गलियों में क्यूँ नही जाता
इसको चलाते हुए अब मैं कोई धुन क्यूँ नही गुनगुनाता
जानबूझ के ग़लत रास्तों पे इसे लेकर क्यूँ नही जाता
बिना बात के सड़कों पे इसे तेज़ क्यूँ नही दौडाता
जैसे ही इससे नज़रें मिलती, बस सवाल ही करती थी
मुझसे ज़्यादा शायद वो तुम्हे याद करती थी
तुम्हारे घर के करीब जो मेकेनिक था न
उसके पास आज मैं बाइक छोड़ आया हूँ
बहुत आवाज़ करने लगी है पिछले चाँद रोज़ से
ये कहके उसे ग्राहक ढूँढने को बोल आया हूँ

पहचान

(Chennai, 5 May 2009)

यूँ तो उम्र बितायी थी उसके साथ
तो कुछ मरासिम जुड़ ही गए,
मेरी पहचान भी वही था और
मेरे और जहाँ के दरम्यान भी वही था.
मगर मुआं नाम ना मेरी शख्सियत के साथ जाता था
ना ही मेरी शख्सियत इस नाम के साथ

हर रिश्ते की तरह यहाँ भी कुछ कमी थी शायद
बरसों से ज़िन्दगी वहीँ थमी थी शायद
ना थे आसार और ना थी तवक्को हालात के बदलने की
हमने भी आदत डाल ली वक़्त के साथ साथ चलने की.

फिर इक रोज़ जाने किधर से
उस नए नाम सेआवाज़ दी तुमने
तो जीने के जैसे माने मिल गए
ज़िन्दगी को चलने के जैसे बहाने मिल गए
ये नाम मेरी शख्सियत के साथ भी जाता था
और शख्सियत इस नाम के साथ भी

यूँ तो अब इक अर्सा हुआ तुम्हे भी खामोश हुए
मगर अब भी मैं ख्वाबों के तागे बुनता रहता हूँ
ध्यान लगा कर तन्हाई में सन्नाटे सुनता रहता हूँ
क्या खबर कभी अचानक से फिर से वक़्त चलने लगे
किसे पता कभी कोई रात में आवाज़ लगाए
और हौले से फिर इक बार कहे "Oye Cartoooooon"

वो इक नाम जो शख्सियत के साथ जाता था .....

शायर और ज़िन्दगी

(Delhi, June 2010)
इक रोज़ ज़िन्दगी ने शायर को तन्हा पकड़ा

गुद्दी हाथ में लेकर दो तमाचे लगाये और कहा

"कब बंद करोगे अपनी ये उल-जलूल हरकतें,
कब तक देखोगे जो कभी हुआ ही नहीं,
कब तक दिखाओगे जो कभी होगा ही नहीं.
क्यूँ तुम मुझे जाने पहचानने कि कोशिश करते हो,
क्यूँ नहीं तुम सबकी तरह चुपचाप जीते और मरते हो.
क्यूँ इस वक़्त से पूछते हो कि ये कभी रुकता क्यों नहीं,
क्यूँ पानी से पूछते हो कि ये कभी जलता क्यों नहीं.
कभी चाँद के दाग देख कर उसके चाल चलन पे ताने कसते हो.
कभी सूरज को अलविदा कह के कभी ना आने को कहते हो.
सबने शिकायत कि है तुम्हारी कि सबको तंग करते हो,
ना खुद चैन से जीते हो ना दूसरो को जीने देते हो.
आज हत्थे चढ़े हो अब तुम्हे सीधा कर के ही जाऊँगी."

बड़ी मुश्किल से उस रोज़ शायर ने ज़िन्दगी से पीछा छुड़ाया
और तब से ही ज़िन्दगी और शायर कि "Guriella war" चालू है
इसीलिए अब शायर अँधेरे कमरों में छुप-छुप के लिखता है