(Delhi, June 2010)
इक रोज़ ज़िन्दगी ने शायर को तन्हा पकड़ा
गुद्दी हाथ में लेकर दो तमाचे लगाये और कहा
"कब बंद करोगे अपनी ये उल-जलूल हरकतें,
कब तक देखोगे जो कभी हुआ ही नहीं,
कब तक दिखाओगे जो कभी होगा ही नहीं.
क्यूँ तुम मुझे जाने पहचानने कि कोशिश करते हो,
क्यूँ नहीं तुम सबकी तरह चुपचाप जीते और मरते हो.
क्यूँ इस वक़्त से पूछते हो कि ये कभी रुकता क्यों नहीं,
क्यूँ पानी से पूछते हो कि ये कभी जलता क्यों नहीं.
कभी चाँद के दाग देख कर उसके चाल चलन पे ताने कसते हो.
कभी सूरज को अलविदा कह के कभी ना आने को कहते हो.
सबने शिकायत कि है तुम्हारी कि सबको तंग करते हो,
ना खुद चैन से जीते हो ना दूसरो को जीने देते हो.
आज हत्थे चढ़े हो अब तुम्हे सीधा कर के ही जाऊँगी."
बड़ी मुश्किल से उस रोज़ शायर ने ज़िन्दगी से पीछा छुड़ाया
और तब से ही ज़िन्दगी और शायर कि "Guriella war" चालू है
इसीलिए अब शायर अँधेरे कमरों में छुप-छुप के लिखता है