Friday, February 20, 2015

पहचान

(Chennai, 5 May 2009)

यूँ तो उम्र बितायी थी उसके साथ
तो कुछ मरासिम जुड़ ही गए,
मेरी पहचान भी वही था और
मेरे और जहाँ के दरम्यान भी वही था.
मगर मुआं नाम ना मेरी शख्सियत के साथ जाता था
ना ही मेरी शख्सियत इस नाम के साथ

हर रिश्ते की तरह यहाँ भी कुछ कमी थी शायद
बरसों से ज़िन्दगी वहीँ थमी थी शायद
ना थे आसार और ना थी तवक्को हालात के बदलने की
हमने भी आदत डाल ली वक़्त के साथ साथ चलने की.

फिर इक रोज़ जाने किधर से
उस नए नाम सेआवाज़ दी तुमने
तो जीने के जैसे माने मिल गए
ज़िन्दगी को चलने के जैसे बहाने मिल गए
ये नाम मेरी शख्सियत के साथ भी जाता था
और शख्सियत इस नाम के साथ भी

यूँ तो अब इक अर्सा हुआ तुम्हे भी खामोश हुए
मगर अब भी मैं ख्वाबों के तागे बुनता रहता हूँ
ध्यान लगा कर तन्हाई में सन्नाटे सुनता रहता हूँ
क्या खबर कभी अचानक से फिर से वक़्त चलने लगे
किसे पता कभी कोई रात में आवाज़ लगाए
और हौले से फिर इक बार कहे "Oye Cartoooooon"

वो इक नाम जो शख्सियत के साथ जाता था .....

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