(मई 2007, भिवानी में बचपन की गलियों से गुजरते हुए स्कूल के दिन याद करते हुए)
जाने कब सहर होती थी, जाने कब दिन ढलता था.
हर रास्ता शहर का तेरी गली में ही निकलता था,
तू हंस के कुछ कह दे तो दिन आसमा पे गुजरता था.
हवाओं में कायनात बनाना मिटाना बस यही काम था,
यूँ तो खुश था दिल, बस दुनिया के लिए नाकाम था.
भटकता मिला था एक ब्राह्मण,
सब कहते हैं वो सच्चा था,
उसने कहा था बुरा,
मगर दिल को आज भी लगता है वो साल अच्छा था.
अब सोचता हूँ तो लगता है शायद मैं बदल गया हूँ,
उमर के साथ साथ ज़िन्दगी के सांचे में ढल गया हूँ.
ये और ही साल है, अब वक्त रेंग रेंग कर चलता है,
रात सूरज की राह देखती, सूरज शाम का रास्ता तकता है.
अब भी कई बार मैं पुराने ज़ख्म कुरेद लेता हूँ,
कभी कभी रातों को तेरे बारे में सोच लेता हूँ.
कई दफा तेरी गलियों के मोड़ तक भी चला जाता हूँ
तेरे कूचे के नीचे अपने जैसे किसी शख्स को खड़ा पता हूँ
तब से सोचता है तू मिलेगी दिल भी कैसा नादान बच्चा है,
इसको जब से एक ब्राह्मण ने कहा है कि ये साल अच्छा है."