Friday, March 20, 2015

क़र्ज़


(मार्च 2007, बस शहर छोड़ने से पहले कहा गया कुछ)

दुनिया ले आज फिर तेरा थोडा सा क़र्ज़ उतार दिया,
किसी तरह से तेरे यहाँ एक और दिन गुज़ार दिया.

उम्र भर मोड़ पर सोचा किया, किसके साथ चले
आवारगी से था लगाव, जंजीरों ने बेंतेहा प्यार दिया

जब तक जिए सूद दिया, कज़ा तक पाई-पाई की वसूल,
तेरी खुदाई से जो मिला, लगा बनिए ने कुछ उधार दिया.

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