(अप्रैल 2007, वर्धा एक शाम अकेले गांव में घंटों भटकने के बाद)
रात भर नींद न आना कोई वजह नही रोने के लिए
ज़िन्दगी के बाद इक सदी मिलेगी सोने के लिए
वो थक गया या हमें आदत हो गई सहने की
अब काफी नही उसके ज़ुल्म आँखें भिगोने के लिए
तुम भी गए चलो यूँ कुछ भला ही हुआ अपना
अब कुछ रहा ही नही पास में खोने के लिए
रात भर नींद न आना कोई वजह नही रोने के लिए
ज़िन्दगी के बाद इक सदी मिलेगी सोने के लिए
वो थक गया या हमें आदत हो गई सहने की
अब काफी नही उसके ज़ुल्म आँखें भिगोने के लिए
तुम भी गए चलो यूँ कुछ भला ही हुआ अपना
अब कुछ रहा ही नही पास में खोने के लिए
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