Friday, March 20, 2015

पुराने ख्वाब

(जनवरी 2007, कलकत्ता की इक हलकी सी उदास सुबह)

"फ़िर तेरे शहर में हमको कितने अफसाने मिले,
नई हकीकतें मिली और ख्वाब पुराने मिले.

काफिरों के गुनाहों से परेशान वाइज़ दिखे,
और गुनाह कर के मुस्कुराते दीवाने मिले.

जहां गए, जिससे मिले दोस्ती कर ली हमने,
क्या पता, कब किससे तेरी ख़बर ना जाने मिले.

यूँ तो हर सवाल का जवाब मिल ही गया हमको
बस तेरे बाद, जीने के ना हमको बहाने मिले.

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