(नेपाल 2008, बस में अनसोई सी इक रात)
याद हो जिसे तेरे वादे, सच उसको बतलाएं कैसे,
ज़हन जानता है जो भी, वो दिल को समझाएं कैसे.
तुझे ये शिकायत मैं याद नही करता तुझको,
अपनी उलझन न सुलझे कि तुझे भुलाएं कैसे.
न जोड़ते मरासिम तो खुश होते आज हम भी,
अब माज़ी में गुज़रा कल बदल के आए कैसे.
गर रो दिए तो रकीब से फ़िर हार जायेंगे,
मुश्किल ये उसके सामने मुस्कुराएं कैसे.
नज़रें फेर लेता है अब वो हमको देखते ही,
इमां को मार कर, ज़ख्म उसे दिखलायें कैसे.
जागे तो सोचेंगे, आँख लगी तो देखेंगे उसे,
रोज़ का यही सवाल आज रात बिताएं कैसे.
No comments:
Post a Comment