Friday, March 20, 2015

मैं और वक़्त

(2006 में अकेले अपने कमरे में बैठे हुए गुजरे वक़्त से की गयी एक मुलाकात)

एक अर्से बाद आज वो पुराना दोस्त मिला
जैसे घर का कोने वाला कमरा फिर खुला
दोनो यारों ने मिलकर
पुरानी बातों के सामान को काफ़ी देर तक देखा
और जाना वक़्त ने काफ़ी गहरी धूल जमा कर दी है,

पहले तो वक़्त को जी भर के कोसा और उसके बाद
यादों के कपड़े से सब पुराने किस्से चमकाए,
कुछ पर ऐसी गहरी काली परत जमी थी
कि रगड़ने के बाद भी पहचान ना हो सकी,
और कुछ इतने चमकने लगे
जैसे अभी बिल्कुल नये बाज़ार से ख़रीदे हों

वो हर शाम को बिना बात के
उसकी गली के चक्कर लगाने वाला क़िस्सा,
तिरछी नज़रों से चुपके से उस बरामदे मैं देखना
अभी जैसे कल ही हुआ हो ये सब - और इतनी गहरी धूल?
हमने फिर वक़्त को झंझोरा,
ग़ुस्से से देखा और बोला
क्यों इतनी धूल जमा दी थी?
इतनी लापरवाही भी करता है क्या कोई?
तुम तो ऐसे चलते हो जैसे
 हमारी ज़िंदगी कोई मज़ाक़ हो तुम्हारे लिए.
वक़्त ने बस मुस्करा के देखा और कहा
क्यूं फिर भूल गये ज़िंदगी के खेल में
शुरू से ही हम तुम एक दूजे को
ऐसे हँसी- हँसी में ही तो लेते आए हैं
क्या हुआ आज अचानक से इतने गंभीर क्यूं हो गये तुम..
भूल गये क्या अपने ही खेल के नियम,
लगता है अब तुम्हारी उम्र ढलने लगी है,
अब तुम ज़्यादा दिन ये खेल ना खेल पाओगे

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