(वर्धा मई 2007, दिनों तक किसानों के साथ बिताये हुए वक़्त का परिणाम)
कब से है ऐसा ही तेरा संसार, इस बरस तो कोई करामात करो,
बेघरों को आबाद करो, बसे हुओं को बरबाद करो.
भूख, बीमारी, अन्याय सब गरीब के घर की रौनक हैं,
अमीरजादों की खातिर भी कोई बला कभी इज्जाद करो.
तेरे यहाँ पीना मुश्किल, बिन पिए अपना जीना मुश्किल,
कभी तुम ही मैखाने में आकर हमसे मुलाकात करो.
फ़िर चाहे सज़ा देना, चाहे सुधार लेना हम काफिरों को
पहले इक बार ख़ुद को बुतखानो से तो आजाद करो
कब से है ऐसा ही तेरा संसार, इस बरस तो कोई करामात करो,
बेघरों को आबाद करो, बसे हुओं को बरबाद करो.
भूख, बीमारी, अन्याय सब गरीब के घर की रौनक हैं,
अमीरजादों की खातिर भी कोई बला कभी इज्जाद करो.
तेरे यहाँ पीना मुश्किल, बिन पिए अपना जीना मुश्किल,
कभी तुम ही मैखाने में आकर हमसे मुलाकात करो.
फ़िर चाहे सज़ा देना, चाहे सुधार लेना हम काफिरों को
पहले इक बार ख़ुद को बुतखानो से तो आजाद करो
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