(Kolkata Mar 2008)
वो मेरी बाइक याद है तुम्हे
जिसपे रात भर आवारों की तरह
शहर की गलियों की धूल फांकते थे
बारिशों के मौसम में ऑफिस से
छुट्टी मार शहर के रास्ते नापते थे
मोड़ की दुकान से दूसरे शहर घूम कर आने तक
तुम्हारे हाथ के कंधे से कमर तक जाने तक
सब कुछ इसने चुपचाप देखा कभी कुछ नही कहा
मगर पिछले कुछ दिनों से ये बहकी-बहकी सी रहती थी
जब भी इसकी तरफ़ देखता जाने क्या-क्या कहती थी
पूछती थी की अब मैं तुम्हारी गलियों में क्यूँ नही जाता
इसको चलाते हुए अब मैं कोई धुन क्यूँ नही गुनगुनाता
जानबूझ के ग़लत रास्तों पे इसे लेकर क्यूँ नही जाता
बिना बात के सड़कों पे इसे तेज़ क्यूँ नही दौडाता
जैसे ही इससे नज़रें मिलती, बस सवाल ही करती थी
मुझसे ज़्यादा शायद वो तुम्हे याद करती थी
तुम्हारे घर के करीब जो मेकेनिक था न
उसके पास आज मैं बाइक छोड़ आया हूँ
बहुत आवाज़ करने लगी है पिछले चाँद रोज़ से
ये कहके उसे ग्राहक ढूँढने को बोल आया हूँ
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