Friday, March 20, 2015

बचपन और ग़ालिब


(मई 2007, भिवानी में बचपन की गलियों से गुजरते हुए स्कूल के दिन याद करते हुए)

"वो एक साल था जब वक्त पंख लगा कर उड़ता था,
जाने कब सहर होती थी, जाने कब दिन ढलता था.
हर रास्ता शहर का तेरी गली में ही निकलता था,
तू हंस के कुछ कह दे तो दिन आसमा पे गुजरता था.
हवाओं में कायनात बनाना मिटाना बस यही काम था,
यूँ  तो खुश था दिल, बस दुनिया के लिए नाकाम था.
भटकता मिला था एक ब्राह्मण,
सब कहते हैं वो सच्चा था,
उसने कहा था बुरा,
मगर दिल को आज भी लगता है वो साल अच्छा था.

अब सोचता हूँ तो लगता है शायद मैं बदल गया हूँ,
उमर के साथ साथ ज़िन्दगी के सांचे में ढल गया हूँ.
ये और ही साल है, अब वक्त रेंग रेंग कर चलता है,
रात सूरज की राह देखती, सूरज शाम का रास्ता तकता है.
अब भी कई बार मैं पुराने ज़ख्म कुरेद लेता हूँ,
कभी कभी रातों को तेरे बारे में सोच लेता हूँ.
कई दफा तेरी गलियों के मोड़ तक भी चला जाता हूँ
तेरे कूचे के नीचे अपने जैसे किसी शख्स को खड़ा पता हूँ
तब से सोचता है तू मिलेगी दिल भी कैसा नादान बच्चा है,
इसको जब से एक ब्राह्मण ने कहा है कि ये साल अच्छा है."

पुराने ख्वाब

(जनवरी 2007, कलकत्ता की इक हलकी सी उदास सुबह)

"फ़िर तेरे शहर में हमको कितने अफसाने मिले,
नई हकीकतें मिली और ख्वाब पुराने मिले.

काफिरों के गुनाहों से परेशान वाइज़ दिखे,
और गुनाह कर के मुस्कुराते दीवाने मिले.

जहां गए, जिससे मिले दोस्ती कर ली हमने,
क्या पता, कब किससे तेरी ख़बर ना जाने मिले.

यूँ तो हर सवाल का जवाब मिल ही गया हमको
बस तेरे बाद, जीने के ना हमको बहाने मिले.

प्रार्थना

(वर्धा मई 2007, दिनों तक किसानों के साथ बिताये हुए वक़्त का परिणाम)

कब से है ऐसा ही तेरा संसार, इस बरस तो कोई करामात करो,
बेघरों को आबाद करो, बसे हुओं को बरबाद करो.

भूख, बीमारी, अन्याय सब गरीब के घर की रौनक हैं,
अमीरजादों की खातिर भी कोई बला कभी इज्जाद करो.

तेरे यहाँ पीना मुश्किल, बिन पिए अपना जीना मुश्किल,
कभी तुम ही मैखाने में आकर हमसे मुलाकात करो.

फ़िर चाहे सज़ा देना, चाहे सुधार लेना हम काफिरों को
पहले इक बार ख़ुद को बुतखानो से तो आजाद करो

तुम्हारा जाना

(अप्रैल 2007, वर्धा एक शाम अकेले गांव में घंटों भटकने के बाद)

रात भर नींद न आना कोई वजह नही रोने के लिए
ज़िन्दगी के बाद इक सदी मिलेगी सोने के लिए

वो थक गया या हमें आदत हो गई सहने की
अब काफी नही उसके ज़ुल्म आँखें भिगोने के लिए

तुम भी गए चलो यूँ कुछ भला ही हुआ अपना
अब कुछ रहा ही नही पास में खोने के लिए

क़र्ज़


(मार्च 2007, बस शहर छोड़ने से पहले कहा गया कुछ)

दुनिया ले आज फिर तेरा थोडा सा क़र्ज़ उतार दिया,
किसी तरह से तेरे यहाँ एक और दिन गुज़ार दिया.

उम्र भर मोड़ पर सोचा किया, किसके साथ चले
आवारगी से था लगाव, जंजीरों ने बेंतेहा प्यार दिया

जब तक जिए सूद दिया, कज़ा तक पाई-पाई की वसूल,
तेरी खुदाई से जो मिला, लगा बनिए ने कुछ उधार दिया.

शहर

(Aug 2006, कालेज में हुई एक बहस के बाद)

हर शख्स इस शहर का क्यूँ मुझको डरता है,
पूछा नही मैंने, फ़िर भी मुझे रास्ता दिखाता है.

कुछ राहें जंगल से होकर भी मंजिल को जाती है
मगर पक्की सड़क पर ही हर कोई चलता जाता है

पहले बरसात के साथ मिटटी की खुशबू भी लाता था
कुछ साल हुए बादल अब बस पानी बरसाने आता है


मैं और वक़्त

(2006 में अकेले अपने कमरे में बैठे हुए गुजरे वक़्त से की गयी एक मुलाकात)

एक अर्से बाद आज वो पुराना दोस्त मिला
जैसे घर का कोने वाला कमरा फिर खुला
दोनो यारों ने मिलकर
पुरानी बातों के सामान को काफ़ी देर तक देखा
और जाना वक़्त ने काफ़ी गहरी धूल जमा कर दी है,

पहले तो वक़्त को जी भर के कोसा और उसके बाद
यादों के कपड़े से सब पुराने किस्से चमकाए,
कुछ पर ऐसी गहरी काली परत जमी थी
कि रगड़ने के बाद भी पहचान ना हो सकी,
और कुछ इतने चमकने लगे
जैसे अभी बिल्कुल नये बाज़ार से ख़रीदे हों

वो हर शाम को बिना बात के
उसकी गली के चक्कर लगाने वाला क़िस्सा,
तिरछी नज़रों से चुपके से उस बरामदे मैं देखना
अभी जैसे कल ही हुआ हो ये सब - और इतनी गहरी धूल?
हमने फिर वक़्त को झंझोरा,
ग़ुस्से से देखा और बोला
क्यों इतनी धूल जमा दी थी?
इतनी लापरवाही भी करता है क्या कोई?
तुम तो ऐसे चलते हो जैसे
 हमारी ज़िंदगी कोई मज़ाक़ हो तुम्हारे लिए.
वक़्त ने बस मुस्करा के देखा और कहा
क्यूं फिर भूल गये ज़िंदगी के खेल में
शुरू से ही हम तुम एक दूजे को
ऐसे हँसी- हँसी में ही तो लेते आए हैं
क्या हुआ आज अचानक से इतने गंभीर क्यूं हो गये तुम..
भूल गये क्या अपने ही खेल के नियम,
लगता है अब तुम्हारी उम्र ढलने लगी है,
अब तुम ज़्यादा दिन ये खेल ना खेल पाओगे